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परहित सरिस धर्म नहिं भाई

रामचरित मानस की एक लाइन है, ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई।’ आम आदमी को धर्म का मर्म सरल ढंग से समझाने के लिए मानस की चौपाई की यह अर्धाली बहुत ही उपयुक्त है। सार यह है कि दूसरों की भलाई करने जैसा कोई दूसरा धर्म नहीं है।  सभी धर्म की सभी परिभाषाओं और व्याख्याओं का निचोड़ है अच्छा बनना और अच्छा करना। और दूसरों की भलाई करना तो निस्संदेह अच्छा करना है। सभी मजहबों ने एकमत होकर जिस बात पर जोर दिया है, वह है मानवता की सेवा यानी ‘सर्वभूत हितेरता’ होना। भूखे को भोजन कराना, वस्त्रहीनों को वस्त्र देना, बीमार लोगों की देखभाल करना, भटकों को सही मार्ग पर लगाना आदि धर्म का पालन करना है, क्योंकि धर्म वह शाश्वत तत्व है जो सर्व कल्याणकारी है। ईश्वर ने स्वयं यह प्रकृति ऐसी रची है कि जिसमें अनेकचेतन और जड़ जीव इसी धर्म (परहित) के पालन में लगे रहते हैं।